खंडवा- मध्यप्रदेश वन विभाग में हाल ही में जारी पदोन्नति आदेश ने कर्मचारियों के बीच असंतोष की लहर पैदा कर दी है। विभाग के कर्मचारियों ने मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) को विस्तृत ज्ञापन सौंपकर पदोन्नति प्रक्रिया की पारदर्शिता, वरिष्ठता सूची, आरक्षण रोस्टर और स्थानांतरण आदेशों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कर्मचारियों ने मांग की है कि जब तक सभी आपत्तियों का निराकरण नहीं हो जाता, तब तक पदोन्नति आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगाई जाए।
कर्मचारियों का कहना है कि वर्ष 2008 से नियुक्त वनरक्षकों की वृत्त (सर्किल) स्तर की वर्षवार वरिष्ठता सूची आज तक सार्वजनिक नहीं की गई है। उनका आरोप है कि लगभग 18 वर्षों से सेवा दे रहे कर्मचारियों को अपने वास्तविक वरिष्ठता क्रम की जानकारी ही नहीं है। ऐसे में पदोन्नति का आधार क्या रखा गया, यह स्पष्ट नहीं होने से पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है। कर्मचारियों का कहना है कि बिना वरिष्ठता सूची सार्वजनिक किए पदोन्नति आदेश जारी करना पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया की भावना के विपरीत है।
ज्ञापन में कर्मचारियों ने पदोन्नति में आरक्षण नियमों के पालन को लेकर भी गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। उनका कहना है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के लिए निर्धारित आरक्षण के बाद शेष पद अनारक्षित श्रेणी में होने चाहिए, लेकिन जारी आदेश में सामान्य एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित श्रेणियों का निर्धारण नियमों के अनुरूप प्रतीत नहीं होता। कर्मचारियों ने विभाग से मांग की है कि पदोन्नति किस नियम, रोस्टर और शासन के किस आदेश के आधार पर की गई, इसकी प्रमाणित जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
कर्मचारियों ने यह भी स्पष्ट किया है कि जब तक वरिष्ठता सूची और आरक्षण संबंधी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो जाती, तब तक पदोन्नति आदेश को प्रभावी नहीं किया जाना चाहिए। उनका कहना है कि यदि बिना स्पष्टीकरण के आदेश लागू किए गए तो भविष्य में कई प्रशासनिक और कानूनी विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
सबसे अधिक विरोध स्थानांतरण आदेशों को लेकर सामने आया है। कर्मचारियों का कहना है कि जिन अधिकारियों-कर्मचारियों ने स्वयं इच्छित पदस्थापना मांगी थी, उन्हें उससे कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन बड़ी संख्या में कर्मचारियों को उनकी सहमति के बिना एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिया गया है। कर्मचारियों का आरोप है कि इससे उनके परिवार, बच्चों की पढ़ाई और सामाजिक परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने विभाग से मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए ऐसे कर्मचारियों को यथासंभव वर्तमान पदस्थापना पर बनाए रखने की मांग की है।
मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है, जिस पर विभागीय हलकों में भी चर्चा हो रही है। कर्मचारियों का कहना है कि नियमों के अनुसार मुख्य वन संरक्षक (CCF) को केवल वन मंडल (डिवीजन) स्तर तक ही स्थानांतरण करने का अधिकार प्राप्त है। यदि इससे व्यापक स्तर पर स्थानांतरण आदेश जारी किए गए हैं, तो उनकी वैधानिकता और अधिकार क्षेत्र पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। कर्मचारियों ने मांग की है कि यदि सक्षम प्राधिकारी की सीमा से बाहर जाकर आदेश जारी किए गए हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच कर ऐसे आदेशों को निरस्त किया जाए।
ज्ञापन में कर्मचारियों ने स्पष्ट किया है कि उनका उद्देश्य पदोन्नति का विरोध करना नहीं, बल्कि नियमसम्मत, पारदर्शी और न्यायसंगत पदोन्नति प्रक्रिया सुनिश्चित कराना है। उनका कहना है कि यदि विभाग सभी नियमों का पालन करते हुए वरिष्ठता सूची सार्वजनिक करे, आरक्षण रोस्टर स्पष्ट करे और स्थानांतरण प्रक्रिया की समीक्षा करे, तो कर्मचारियों का विश्वास पुनः बहाल हो सकता है।
वन विभाग में पदोन्नति को लेकर उठे इन सवालों ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें विभागीय अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे कर्मचारियों की आपत्तियों पर क्या निर्णय लेते हैं। यदि इन मांगों पर समय रहते उचित कार्रवाई नहीं होती, तो मामला प्रशासनिक स्तर से आगे कानूनी और संगठनात्मक विवाद का रूप भी ले सकता है।
