खंडवा- लोकतंत्र में विपक्ष को सत्ता का संतुलन माना जाता है। विपक्ष की जिम्मेदारी केवल सरकार और प्रशासन की कमियों को उजागर करना नहीं, बल्कि जनता के मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाकर उनके समाधान तक पहुंचाने की भी होती है। लेकिन खंडवा नगर निगम की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से एक सवाल लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है कि नगर निगम और शहर से जुड़े जिन मुद्दों को नेता प्रतिपक्ष द्वारा बार-बार उठाया गया, आखिर उनमें से कितनों का ठोस परिणाम सामने आया?
शहर के राजनीतिक और सामाजिक हलकों में यह चर्चा आम है कि पिछले तीन वर्षों में जल संकट, नर्मदा जल योजना, भ्रष्टाचार, सड़कों की दुर्दशा, आवारा कुत्तों का आतंक, जल निकासी, निगम के राजस्व स्रोतों, निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और प्रशासनिक कार्यप्रणाली जैसे अनेक मुद्दों को प्रमुखता से उठाया गया, लेकिन अधिकांश मामलों में न तो कोई बड़ी जांच सामने आई और न ही कोई ऐसा परिणाम दिखा जिसे जनता ठोस उपलब्धि मान सके।
नर्मदा जल योजना पर सबसे ज्यादा सवाल, लेकिन समाधान नहीं
फरवरी 2023 से लेकर वर्ष 2025 तक नर्मदा जल योजना लगातार विपक्ष के निशाने पर रही। डिस्ट्रीब्यूशन लाइन की मरम्मत, एजेंसियों को हुए भुगतान, पाइपलाइन की गुणवत्ता, बार-बार पाइपलाइन फूटने की घटनाएं और कथित भ्रष्टाचार के आरोप बार-बार सार्वजनिक मंचों पर उठाए गए।
वर्ष 2024 और 2025 में जल संकट के दौरान विपक्ष ने विश्वा यूटिलिटीज और अन्य संबंधित एजेंसियों पर गंभीर आरोप लगाए। पाइपलाइन के सैकड़ों बार फूटने के दावे किए गए, एफआईआर दर्ज करने की मांग उठी, लेकिन शहरवासियों के बीच आज भी यह सवाल बना हुआ है कि आखिर इन आरोपों का अंतिम परिणाम क्या निकला? क्या किसी जिम्मेदार एजेंसी पर कार्रवाई हुई? क्या किसी जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई? या फिर ये मुद्दे केवल सुर्खियों तक सीमित रह गए?
सड़कें, गड्ढे और जलभराव—हर साल वही कहानी
शहर की खराब सड़कों और बरसात के दौरान जलभराव का मुद्दा भी लगातार उठता रहा। वर्ष 2024 में शहर की सड़कों की बदहाल स्थिति को लेकर आवाज बुलंद की गई। इसके बाद 2025 और 2026 में भी बारिश के दौरान जल निकासी व्यवस्था और नालों की सफाई पर सवाल उठे।
लाल चौकी क्षेत्र का नाला, पार्वतीबाई धर्मशाला के पास बंद नाला, विभिन्न वार्डों की नालियां और जलभराव वाले क्षेत्र लगातार चर्चा में रहे। लेकिन नागरिकों का कहना है कि यदि वर्षों तक एक ही समस्या को बार-बार उठाना पड़े तो यह राजनीतिक सफलता नहीं बल्कि विफलता का संकेत माना जाएगा।
भ्रष्टाचार के आरोपों की गूंज, लेकिन निष्कर्ष का अभाव
नगर निगम में कथित भ्रष्टाचार को लेकर कई बार आरोप लगाए गए। विकास कार्यों की जांच, निगम की वित्तीय कार्यप्रणाली, वाहनों और मशीनों पर खर्च, नर्मदा जल योजना में भुगतान, मोबाइल कंपनियों द्वारा सड़क खुदाई से मिलने वाले शुल्क, गन्ना चरखियों और मांगलिक भवनों से प्राप्त राजस्व जैसे विषयों को प्रमुखता से उठाया गया।
लेकिन वर्षों बाद भी जनता यह जानना चाहती है कि जिन मामलों में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे, उनमें से कितनों में जांच पूरी हुई? कितनों में दोषी पाए गए? और कितनों में कार्रवाई हुई? यदि कोई परिणाम सामने नहीं आया तो स्वाभाविक रूप से आरोपों की गंभीरता पर भी प्रश्न उठते हैं।
आवारा कुत्तों का मुद्दा बना राष्ट्रीय खबर
अगस्त 2026 में आवारा कुत्तों का आतंक और डॉग बाइट की घटनाएं राष्ट्रीय मीडिया तक पहुंचीं। नसबंदी पर लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद समस्या जस की तस रहने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। नसबंदी अभियान में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की जांच की मांग भी की गई।
हालांकि इस मुद्दे ने व्यापक चर्चा जरूर पैदा की, लेकिन शहर के लोगों का कहना है कि वास्तविक सफलता तब मानी जाएगी जब सड़कों पर घूम रहे आवारा कुत्तों की संख्या कम हो और नागरिकों को राहत मिले। केवल मीडिया कवरेज से समस्या का समाधान नहीं होता।
पानी की गुमटियां, नमो वन और स्थानीय मुद्दे भी बने चर्चा का केंद्र
शिवरे झील, शिवरे पाइपलाइन, नमो वन परियोजना, 25-25 हजार रुपये की पानी की गुमटियों, गणेश प्रतिमा विसर्जन कुंड, पदम कुंड संरक्षण और अन्य स्थानीय विषयों को भी समय-समय पर उठाया गया। इन मुद्दों पर बयान, विरोध और सवाल तो सामने आए, लेकिन इनमें से अधिकांश मामलों में जनता को कोई स्पष्ट निष्कर्ष या उपलब्धि दिखाई नहीं दी।
जनता अब परिणाम चाहती है, केवल बयान नहीं
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, लेकिन केवल आरोप लगाने और प्रेस वार्ताएं करने से जनता संतुष्ट नहीं होती। जनता यह भी देखती है कि जिस मुद्दे को नेता बार-बार उठा रहा है, उसे समाधान तक पहुंचाने के लिए उसने कितनी प्रभावी लड़ाई लड़ी।
यदि वर्षों तक एक ही मुद्दा बार-बार उठाना पड़े और फिर भी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव दिखाई न दे, तो जनता के मन में यह धारणा बनना स्वाभाविक है कि मुद्दे केवल राजनीतिक चर्चा का माध्यम बनकर रह गए हैं।
शहर में चर्चा का विषय
इन सभी घटनाक्रमों के बाद शहर में यह चर्चा तेज है कि नेता प्रतिपक्ष ने नगर निगम और शहर से जुड़े लगभग हर महत्वपूर्ण मुद्दे को उठाया, लेकिन अधिकांश मामलों में कोई ठोस परिणाम या निर्णायक उपलब्धि सामने नहीं आ सकी। यही कारण है कि अब नागरिकों के बीच यह सवाल गूंज रहा है कि क्या केवल मुद्दे उठाना ही पर्याप्त है, या फिर जनता को वास्तविक समाधान भी मिलना चाहिए?
राजनीति में मुद्दे उठाना आसान होता है, लेकिन उन्हें अंजाम तक पहुंचाना ही किसी जनप्रतिनिधि की वास्तविक परीक्षा मानी जाती है। खंडवा की जनता अब इसी कसौटी पर अपने नेताओं का मूल्यांकन करती दिखाई दे रही है।
