22 वर्षों बाद भी हरसूद का दर्द नहीं हुआ कम: चंडीगढ़ जैसा शहर बसाने के वादे अधूरे, न्याय, रोजगार और सम्मानजनक पुनर्वास की आज भी प्रतीक्षा

इंदिरा सागर परियोजना से देश को मिली बिजली और सिंचाई, लेकिन हजारों परिवारों ने खो दी अपनी पहचान, आज भी विस्थापित पूछ रहे हैं—क्या विकास की कीमत केवल हम ही चुकाएंगे?

हरसूद/खंडवा। इतिहास के पन्नों में कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो केवल तारीख बनकर नहीं रह जातीं, बल्कि पीढ़ियों तक समाज की स्मृतियों में जीवित रहती हैं। मध्यप्रदेश के हरसूद का विस्थापन भी ऐसी ही एक घटना है। 30 जून 2004 को इंदिरा सागर परियोजना के लिए सदियों पुराना हरसूद नगर और उसके आसपास के 254 से अधिक गांव जलमग्न हो गए। लाखों लोगों ने अपने पूर्वजों की धरोहर, खेत, मकान, दुकानें, मंदिर, स्कूल, बाजार, संस्कृति और सामाजिक पहचान को हमेशा के लिए छोड़ दिया।

उस समय विस्थापितों को भरोसा दिलाया गया था कि उन्हें केवल नया मकान नहीं, बल्कि आधुनिक सुविधाओं से युक्त एक नया शहर मिलेगा। कहा गया कि पुनर्वास क्षेत्र “चंडीगढ़ की तर्ज पर विकसित” किए जाएंगे, जहां चौड़ी सड़कें, बेहतर शिक्षा, आधुनिक अस्पताल, उद्योग, रोजगार और सभी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध होंगी। लेकिन 22 वर्ष बीत जाने के बाद भी हजारों विस्थापित परिवारों का कहना है कि वे आज भी उन वादों के पूरे होने का इंतजार कर रहे हैं।

देश के विकास के लिए अपना सब कुछ समर्पित किया

इंदिरा सागर परियोजना देश की सबसे महत्वपूर्ण बहुउद्देशीय परियोजनाओं में से एक मानी जाती है। इस परियोजना से मध्यप्रदेश सहित कई क्षेत्रों को सिंचाई सुविधा मिली, जल विद्युत उत्पादन बढ़ा और औद्योगिक विकास को गति मिली।

लेकिन इस विकास की सबसे बड़ी कीमत हरसूद और आसपास के ग्रामीणों ने चुकाई। हजारों परिवारों ने अपनी पीढ़ियों की कमाई, उपजाऊ कृषि भूमि, फलते-फूलते व्यापार, धार्मिक आस्था के केंद्र और सामाजिक जीवन को जल में समर्पित कर दिया।

विस्थापितों का कहना है कि उन्होंने राष्ट्रहित में अपना सब कुछ त्याग दिया, लेकिन बदले में उन्हें वह सम्मान और सुविधाएं नहीं मिलीं, जिनका वादा किया गया था।

चंडीगढ़ जैसा शहर बसाने का सपना अधूरा रह गया

पुनर्वास नीति के दौरान लोगों को बताया गया था कि नई बसाहट आधुनिक नगर की तरह विकसित होगी। चौड़ी सड़कें, स्वच्छ पेयजल, उत्कृष्ट स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार के अवसर और उद्योगों की स्थापना से नया हरसूद विकास का मॉडल बनेगा।

लेकिन आज स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है। कई पुनर्वास क्षेत्रों में अब भी आधारभूत सुविधाओं का अभाव है। लोगों का कहना है कि योजनाओं की घोषणा तो हुई, लेकिन अधिकांश वादे धरातल पर पूरे नहीं उतर सके।

रोजगार का संकट सबसे बड़ी समस्या

विस्थापन के बाद सबसे अधिक प्रभावित आजीविका हुई। हजारों किसानों की खेती छूट गई, व्यापारियों का कारोबार समाप्त हो गया और मजदूरों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया।

स्थानीय स्तर पर उद्योग स्थापित नहीं होने से युवाओं को रोजगार के लिए इंदौर, भोपाल, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और अन्य राज्यों में पलायन करना पड़ रहा है।

आज भी बड़ी संख्या में शिक्षित युवा रोजगार की तलाश में अपने परिवारों से दूर जीवन बिताने को मजबूर हैं।

उचित मुआवजे को लेकर आज भी असंतोष

विस्थापित परिवारों का कहना है कि उन्हें उनकी वास्तविक संपत्ति और आजीविका के अनुरूप उचित मुआवजा नहीं मिला। जिन परिवारों के पास उपजाऊ कृषि भूमि, बड़े मकान, दुकानें और वर्षों पुराना व्यवसाय था, वे पुनर्वास के बाद आर्थिक रूप से कमजोर हो गए।

कई लोगों का कहना है कि केवल जमीन या मकान का मूल्य ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक जीवन की जो क्षति हुई, उसकी भरपाई आज तक संभव नहीं हो सकी।

सांस्कृतिक विरासत भी जल में समा गई

हरसूद केवल एक नगर नहीं था। यह निमाड़ की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक आस्था और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक था।

यहां के मंदिर, बाजार, मेले, त्योहार, चौपाल, विद्यालय और सामाजिक जीवन लोगों की पहचान थे। विस्थापन के साथ केवल मकान नहीं डूबे, बल्कि एक पूरी संस्कृति और जीवनशैली भी जलमग्न हो गई।

आज भी बुजुर्ग अपने पुराने मोहल्लों, गलियों, मित्रों और सामाजिक आयोजनों को याद कर भावुक हो जाते हैं।

खेड़ापति हनुमान मंदिर आज भी जोड़ता है अतीत से

पुराने हरसूद का खेड़ापति हनुमान मंदिर आज भी विस्थापितों की आस्था का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है।

हर वर्ष 30 जून को हजारों लोग यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं और अपने डूबे हुए शहर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। यह मंदिर आज भी लोगों को उनके अतीत, संस्कृति और भावनाओं से जोड़ने का कार्य कर रहा है।

स्वास्थ्य और शिक्षा भी बड़ी चुनौती

विस्थापितों का कहना है कि पुनर्वास क्षेत्रों में बेहतर अस्पताल, विशेषज्ञ चिकित्सकों की उपलब्धता और उच्च शिक्षा के पर्याप्त संस्थान आज भी नहीं हैं। गंभीर बीमारियों के उपचार के लिए लोगों को बड़े शहरों का रुख करना पड़ता है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी अपेक्षित स्तर का विकास नहीं होने से विद्यार्थियों को उच्च शिक्षा के लिए अन्य शहरों में जाना पड़ता है।

हर वर्ष लौट आती हैं दर्दभरी यादें

30 जून आते ही हजारों विस्थापित परिवार पुराने हरसूद की ओर रुख करते हैं। कोई अपने पुराने घर की दिशा में खड़ा होकर आंखें नम करता है, तो कोई अपने खेत, विद्यालय या बाजार को याद कर भावुक हो जाता है।

नई पीढ़ी, जिसने पुराना हरसूद कभी देखा ही नहीं, वह अपने बुजुर्गों से उस शहर की कहानियां सुनती है जिसने कभी पूरे निमाड़ की पहचान बनाई थी।

विस्थापितों की प्रमुख मांगें

विस्थापित परिवार आज भी सरकार से मांग कर रहे हैं कि—

  • पुनर्वास नीति की व्यापक समीक्षा की जाए।
  • जिन परिवारों को उचित मुआवजा नहीं मिला, उनके प्रकरणों का पुनर्मूल्यांकन किया जाए।
  • पुनर्वास क्षेत्रों में बड़े उद्योग स्थापित कर स्थानीय युवाओं को रोजगार दिया जाए।
  • स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पेयजल और अन्य मूलभूत सुविधाओं का विस्तार किया जाए।
  • विस्थापित परिवारों के लिए विशेष आर्थिक पैकेज और रोजगार योजनाएं लागू की जाएं।
  • विकास परियोजनाओं में त्याग करने वाले परिवारों को सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित किया जाए।

हरसूद केवल एक डूबा हुआ शहर नहीं, बल्कि विकास की कीमत का प्रतीक

22 वर्षों बाद भी हरसूद का नाम केवल एक डूबे हुए नगर के रूप में नहीं लिया जाता, बल्कि यह उस संघर्ष की पहचान बन चुका है जिसमें हजारों परिवारों ने राष्ट्र के विकास के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया।

आज भी विस्थापितों की आंखों में अपने पुराने शहर की यादें हैं, मन में अधूरे वादों का दर्द है और दिल में एक उम्मीद बाकी है कि शायद कभी उन्हें न्याय मिलेगा।

हरसूद की कहानी केवल अतीत का इतिहास नहीं, बल्कि यह उस सवाल का जीवंत उत्तर भी है कि विकास तभी सार्थक माना जाएगा, जब उसके लिए अपना सब कुछ न्यौछावर करने वाले लोगों को भी समान सम्मान, सुरक्षित भविष्य और खुशहाल जीवन मिले।

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