खंडवा- सनातन धर्म में मांगलिक कार्यों के लिए ग्रह-नक्षत्रों और शुभ मुहूर्त का विशेष महत्व माना जाता है। इसी क्रम में इस वर्ष विवाह, गृह प्रवेश और अन्य शुभ संस्कारों की योजना बना रहे लोगों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है। 25 जुलाई, शनिवार को देवशयनी एकादशी का पर्व मनाया जाएगा, लेकिन उससे पहले ही मांगलिक कार्यों पर विराम लग जाएगा। इसका कारण 14 जुलाई से गुरु (बृहस्पति) तारा का अस्त होना है, जिसे वैदिक ज्योतिष में शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता।
प्रख्यात ज्योतिषाचार्य आचार्य शिव मल्होत्रा के अनुसार, गुरु ग्रह को ज्ञान, धर्म, विवाह, संतान, समृद्धि और शुभ कार्यों का प्रमुख कारक माना गया है। जब गुरु तारा अस्त होता है तो उसकी शुभता का प्रभाव क्षीण हो जाता है। इसलिए इस अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत संस्कार, नामकरण तथा अन्य मांगलिक कार्य सामान्यतः नहीं किए जाते। उन्होंने बताया कि इस वर्ष 12 जुलाई तक शुभ कार्यों के लिए उपलब्ध मुहूर्तों का लाभ लिया जा सकता है।
देवशयनी एकादशी से आरंभ होगा चातुर्मास
आचार्य शिव मल्होत्रा ने बताया कि 25 जुलाई को देवशयनी एकादशी के दिन भगवान श्रीहरि विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार चार माह तक भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और इस अवधि में विवाह सहित अधिकांश मांगलिक कार्य स्थगित कर दिए जाते हैं।
चातुर्मास का समापन देवउठनी एकादशी के दिन होता है। इसके बाद भगवान विष्णु के जागरण के साथ पुनः विवाह और अन्य शुभ कार्यों का शुभारंभ होता है।
आध्यात्मिक साधना का विशेष काल
धार्मिक ग्रंथों में चातुर्मास को आत्मचिंतन, संयम और आध्यात्मिक साधना का श्रेष्ठ समय बताया गया है। इस अवधि में श्रद्धालु व्रत, जप, तप, दान, सत्संग, कथा-श्रवण और भगवान विष्णु की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। मंदिरों में भी विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं और संत-महात्मा धर्मोपदेश के माध्यम से लोगों को सदाचार एवं आध्यात्मिक जीवन का संदेश देते हैं।
आचार्य मल्होत्रा का कहना है कि चातुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं, बल्कि जीवन में अनुशासन, आत्मसंयम और सकारात्मक परिवर्तन का भी अवसर है। इस दौरान सात्विक जीवनशैली अपनाने और धार्मिक कार्यों में भाग लेने से मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव होता है।
शुभ कार्यों के लिए समय सीमित
इस वर्ष गुरु तारा अस्त होने और उसके बाद देवशयनी एकादशी आने के कारण शुभ मांगलिक कार्यों के लिए समय अपेक्षाकृत कम है। ऐसे में जिन परिवारों ने विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन या अन्य संस्कारों की योजना बनाई है, उन्हें 12 जुलाई तक उपलब्ध शुभ मुहूर्तों में अपने कार्यक्रम संपन्न करने की सलाह दी जा रही है।
ज्योतिषाचार्य का कहना है कि शुभ कार्यों की तिथि तय करने से पहले किसी योग्य विद्वान अथवा पंचांग के अनुसार मुहूर्त का विचार अवश्य कर लेना चाहिए, क्योंकि विभिन्न पंचांगों और परंपराओं में तिथियों एवं मुहूर्तों में कुछ अंतर संभव होता है।
धार्मिक परंपरा और सांस्कृतिक महत्व
भारतीय संस्कृति में देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का विशेष स्थान है। यह काल केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और आध्यात्मिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने की परंपरा भी है। वर्षा ऋतु के दौरान साधु-संत एक स्थान पर रहकर धर्मोपदेश देते हैं, जबकि श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठानों, सेवा कार्यों और आत्मसंयम के माध्यम से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करते हैं।
इस प्रकार 14 जुलाई से गुरु तारा अस्त होने और 25 जुलाई से चातुर्मास प्रारंभ होने के कारण आगामी कुछ महीनों तक मांगलिक कार्यों पर विराम रहेगा। धार्मिक मान्यताओं का पालन करने वाले परिवारों के लिए यह समय शुभ संस्कारों की बजाय आध्यात्मिक साधना, पूजा-पाठ और सेवा कार्यों के लिए विशेष महत्व रखेगा।
(नोट: यह लेख धार्मिक एवं ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित है। विभिन्न पंचांगों और परंपराओं के अनुसार तिथियों एवं मुहूर्तों में अंतर संभव है।)

