खंडवा- निर्गुण भक्ति परंपरा के महान संत, समाज सुधारक और मानवता के अमर संदेशवाहक संत कबीरदास की प्रतिमा स्थापना एवं प्राण-प्रतिष्ठा का भव्य धार्मिक आयोजन श्रद्धा, आस्था और सामाजिक समरसता के वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर नगर के विभिन्न समाजों, धर्मप्रेमियों एवं सकल हिंदू समाज के हजारों श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लेकर संत कबीरदासजी के समता, प्रेम और भाईचारे के संदेश को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
यह आयोजन स्वर्गीय अनोखीलाल खरे के उस संकल्प को साकार करने की दिशा में आयोजित किया गया, जिसमें वे संत कबीरदासजी की प्रतिमा स्थापित कर समाज को उनके आदर्शों से जोड़ना चाहते थे। उनके निधन के बाद उनकी सुपुत्री चिंताबाई खरे ने इस संकल्प को पूरा करने का बीड़ा उठाया और पूरे धार्मिक विधि-विधान के साथ प्रतिमा स्थापना का आयोजन कराया।
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुआ। पंडित सत्यनारायण जोशी एवं अन्य विद्वान वेदाचार्यों ने अन्नाधिवास, जलाधिवास, पंचांग पूजन, आवाहित देवता पूजन, हवन तथा प्राण-प्रतिष्ठा जैसे सभी धार्मिक अनुष्ठानों को शास्त्रोक्त विधि से संपन्न कराया। मंत्रोच्चार और यज्ञ की पवित्र अग्नि के बीच प्रतिमा में प्राण-प्रतिष्ठा के साथ पूरा परिसर भक्तिमय वातावरण से गुंजायमान हो उठा।

इस आयोजन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता सामाजिक समरसता का भाव रहा। विभिन्न जातियों, वर्गों और समाजों के लोगों ने बिना किसी भेदभाव के एक साथ सहभागिता कर संत कबीरदासजी के उस संदेश को जीवंत किया, जिसमें उन्होंने मानव मात्र को समान मानते हुए प्रेम, भाईचारे और सद्भाव का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी थी। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि समाज की वास्तविक शक्ति उसकी एकता, समानता और पारस्परिक सम्मान में निहित है।
आयोजन के दौरान संत कबीरदासजी की आरती एवं पूजन के पश्चात विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण कर पुण्य लाभ प्राप्त किया। पूरे कार्यक्रम में अनुशासन, धार्मिक आस्था और सेवा भावना का अद्भुत संगम देखने को मिला।

संत कबीरदासजी का जीवन सत्य, समानता, प्रेम और मानवता की मिसाल रहा है। उनकी शिक्षाएं आज भी समाज को जाति-पांति, ऊंच-नीच और भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सद्भाव रखने की प्रेरणा देती हैं। प्रतिमा स्थापना का यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि संत कबीरदासजी के विचारों को समाज में पुनः स्थापित करने और आने वाली पीढ़ियों तक उनके संदेश को पहुंचाने का प्रेरणादायी प्रयास भी साबित हुआ।

