खंडवा- प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, श्री नीलकंठेश्वर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, खंडवा में भारतीय शिक्षा दिवस के अवसर पर भारतीय ज्ञान परंपरा, चरित्र निर्माण और मूल्यपरक शिक्षा पर केंद्रित प्रेरक व्याख्यान का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, नई दिल्ली (मालवा प्रांत, खंडवा) एवं महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में पंडित भवानी प्रसाद मिश्र सभागार में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के मालवा प्रांत संयोजक श्री सुनील पंड्या ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था की विशेषताओं पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि देश को नई दिशा देनी है तो सबसे पहले शिक्षा व्यवस्था को भारतीय दृष्टिकोण के अनुरूप मजबूत बनाना होगा। उन्होंने कहा कि मातृभूमि, मातृभाषा और भारतीय शिक्षा पद्धति का कोई विकल्प नहीं है। नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, चरित्र निर्माण, वैदिक गणित, पर्यावरण शिक्षा, तकनीकी शिक्षा, शोध, स्वास्थ्य प्रबंधन तथा राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे विषयों पर विस्तार से विचार रखे। उनका कहना था कि शिक्षा केवल रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ नागरिक और जिम्मेदार व्यक्तित्व के निर्माण का आधार है।
विद्यार्थियों से संवाद करते हुए श्री पंड्या ने उन्हें भयमुक्त होकर जीवन जीने, आत्मविश्वास विकसित करने तथा नैतिक मूल्यों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने मातृभाषा के सम्मान, प्लास्टिक और स्क्रीन के अत्यधिक उपयोग से बचने, प्रकृति के अनुरूप जीवनशैली अपनाने, बचत की आदत विकसित करने तथा परीक्षा के समय तनावमुक्त रहकर आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन करने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि व्यक्ति का चरित्र ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी होता है, इसलिए शिक्षा का अंतिम उद्देश्य चरित्रवान समाज का निर्माण होना चाहिए।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सोमपाल सिंह ने कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल ज्ञानार्जन नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है। उन्होंने कहा कि समाज में स्वस्थ संवाद की संस्कृति अत्यंत आवश्यक है। नए विचार और सार्थक समाधान तभी जन्म लेते हैं जब संवाद, विचार-विमर्श और सकारात्मक चिंतन को बढ़ावा दिया जाए।
डॉ. सिंह ने विद्यार्थियों से किसी भी विचार का विरोध करने से पहले उसके बेहतर विकल्प पर विचार करने का आग्रह किया। उन्होंने पुस्तकों के अध्ययन की आदत, जिम्मेदारी, चिंतन, भारतीय भाषाओं के संरक्षण, स्वामी विवेकानंद के मानवीय दर्शन, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति, प्रकृति संरक्षण तथा भारतीय परंपराओं के मनोवैज्ञानिक महत्व पर भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल ज्ञान देने वाला नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का निर्माता होता है और प्रत्येक विद्यार्थी को अपनी क्षमता के अनुरूप लक्ष्य निर्धारित कर निरंतर आगे बढ़ना चाहिए।
कार्यक्रम की संयोजक डॉ. मीना राठौर ने निमाड़ी लोकगीत की मधुर प्रस्तुति देकर कार्यक्रम को सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की तथा सफल संचालन भी किया। अंत में प्रो. कुलदीप सिंह रावत ने सभी अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस अवसर पर डॉ. गणेश प्रसाद दावरे, डॉ. मनीष सिंह, डॉ. कुलदीप सिंह फुरे, डॉ. रेखा गुंजन, डॉ. एस.के. गोयल, डॉ. गजानंद वास्कले, डॉ. सोहन सिंह डावर, प्रो. महेश भावोर सहित महाविद्यालय का समस्त शैक्षणिक स्टाफ उपस्थित रहा। बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं ने कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक भाग लिया। संवादात्मक वातावरण, प्रेरक विचारों और भारतीय संस्कृति पर आधारित संदेशों ने कार्यक्रम को ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायी और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी बना दिया।
भारतीय शिक्षा दिवस पर आयोजित इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि आधुनिक शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा, नैतिक मूल्य और सांस्कृतिक चेतना का समन्वय ही राष्ट्र निर्माण की मजबूत आधारशिला बन सकता है। नई शिक्षा नीति के उद्देश्यों को साकार करने के लिए ऐसी पहलें युवाओं को न केवल गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करती हैं, बल्कि उन्हें जिम्मेदार, संस्कारित और राष्ट्रहित के प्रति समर्पित नागरिक बनने की प्रेरणा भी देती हैं।

