खंडवा- भारतीय संस्कृति में गुरु को ज्ञान, संस्कार और जीवन-दर्शन का आधार माना गया है। इसी महान गुरु-शिष्य परंपरा के गौरव को स्मरण करते हुए प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, श्री नीलकण्ठेश्वर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, खंडवा में दर्शनशास्त्र विभाग, भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ एवं राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) के संयुक्त तत्वावधान में “महर्षि सांदीपनि गुरु पर्व” का गरिमामय आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा, गुरु के महत्व, आदर्श गुरु-शिष्य संबंध और आधुनिक समय में नैतिक मूल्यों की आवश्यकता पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सोमपाल सिंह द्वारा माँ सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण, दीप प्रज्ज्वलन एवं पूजन के साथ हुआ। इसके बाद अतिथियों का स्वागत किया गया और विद्यार्थियों को गुरु पूर्णिमा तथा महर्षि सांदीपनि की शिक्षाओं के महत्व से परिचित कराया गया।
गुरु अज्ञान से ज्ञान की ओर ले जाने वाला पथप्रदर्शक
मुख्य वक्ता डॉ. गणेश प्रसाद डावरे ने अपने प्रेरक उद्बोधन में उपनिषदों के महामंत्र “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमय” का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु वह शक्ति है जो मनुष्य को अज्ञान से ज्ञान, अंधकार से प्रकाश तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जाती है। उन्होंने माता को मनुष्य का प्रथम गुरु बताते हुए महर्षि सांदीपनि के आश्रम की शिक्षा व्यवस्था का विस्तार से वर्णन किया।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और महर्षि सांदीपनि के गुरु-शिष्य संबंध का उल्लेख करते हुए कहा कि श्रीकृष्ण ने अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए यमलोक से गुरु-पुत्र को वापस लाकर गुरु-दक्षिणा का सर्वोच्च आदर्श स्थापित किया। यह प्रसंग आज भी गुरु के प्रति समर्पण और श्रद्धा का अनुपम उदाहरण माना जाता है।
पहले आदर्श शिष्य बनें, तभी ज्ञान का वास्तविक लाभ मिलेगा
इतिहास विभागाध्यक्ष डॉ. रेखा गुंजन ने कहा कि गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि समस्त गुरु परंपरा के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए पहले स्वयं को आदर्श शिष्य बनाना आवश्यक है, क्योंकि ज्ञान का वास्तविक अधिकारी वही बन सकता है जो विनम्रता, अनुशासन और समर्पण के साथ गुरु का सम्मान करता है।
गुरु जीवन का गुरुत्व केंद्र है
गणित विभागाध्यक्ष प्रो. प्रवीण कुमार पाटिल ने विज्ञान और अध्यात्म का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करते हुए कहा कि जैसे किसी भी वस्तु का संतुलन उसके गुरुत्व केंद्र (Centre of Gravity) पर आधारित होता है, उसी प्रकार मनुष्य के जीवन का संतुलन भी गुरु के मार्गदर्शन से बना रहता है। उन्होंने कहा कि गुरु वह केंद्र है जिसके चारों ओर ज्ञान, संस्कार, नैतिकता और जीवन के आदर्श संचालित होते हैं।
युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देना समय की आवश्यकता
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सोमपाल सिंह ने कहा कि गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का मूर्तिकार होता है। उन्होंने विद्यार्थियों को जीवन में यह समझने की सीख दी कि कहाँ आगे बढ़ना है और कहाँ संयम अपनाना है।
उन्होंने वर्तमान Generation Z का उल्लेख करते हुए कहा कि आज के युवाओं में अपार ऊर्जा और प्रतिभा है, लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि उस ऊर्जा को सकारात्मक दिशा मिले। यदि युवा अपनी क्षमता का सही उपयोग करें तो वे असंभव लक्ष्य भी प्राप्त कर सकते हैं।
प्राचार्य ने कहा कि सच्चा गुरु कभी भेदभाव नहीं करता। वह प्रत्येक शिष्य को समान भाव से ज्ञान प्रदान करता है। भारतीय गुरुकुल परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अनुशासन, साधना, व्यायाम, संस्कार और चरित्र निर्माण हमारी शिक्षा व्यवस्था की आत्मा रहे हैं।
सुकरात, प्लेटो और महर्षि सांदीपनि के उदाहरणों से समझाया गुरु का महत्व

डॉ. सोमपाल सिंह ने यूनानी दार्शनिक सुकरात और उनके शिष्य प्लेटो का उदाहरण देते हुए कहा कि महान शिष्य अपने गुरु के विचारों को युगों तक जीवित रखते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु जीवन की विकृतियों, भ्रम और संदेह को दूर कर व्यक्ति को सही मार्ग दिखाता है।
उन्होंने महर्षि सांदीपनि और भगवान श्रीकृष्ण के संबंध को भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा का श्रेष्ठ उदाहरण बताते हुए कहा कि किसी भी महान व्यक्तित्व के निर्माण में गुरु की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। साथ ही उन्होंने प्रकृति को भी महान गुरु बताते हुए कहा कि नदी, पर्वत, वृक्ष और संपूर्ण प्रकृति हमें निरंतर जीवन जीने की प्रेरणा देती है।
ज्ञान गंगा की प्रस्तुति से भारतीय ज्ञान परंपरा का संदेश
कार्यक्रम के दौरान ज्ञान गंगा चैनल के माध्यम से उपनिषदों पर आधारित प्रेरक प्रस्तुति का प्रदर्शन किया गया। इसकी व्याख्या करते हुए प्राचार्य ने विद्यार्थियों से कहा कि आज मोबाइल और रील संस्कृति युवाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही है। उन्होंने विद्यार्थियों से भारतीय ज्ञान परंपरा, प्रेरणादायी साहित्य और ज्ञानवर्धक माध्यमों से जुड़ने का आह्वान करते हुए कहा कि वास्तविक गुरु वही है जो जीवन को सही दिशा प्रदान करे।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां
कार्यक्रम के सांस्कृतिक सत्र में छात्रा हर्षिता ठाकुर ने गुरु महिमा पर आधारित भावपूर्ण कविता प्रस्तुत कर सभी को भावविभोर कर दिया। वहीं छात्र रिनेश ने गुरु वंदना का मधुर गीत प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इस अवसर पर विद्यार्थियों ने सभी गुरुजनों का तिलक लगाकर एवं पुष्प अर्पित कर सम्मान किया, जिससे भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा का सजीव स्वरूप देखने को मिला।
कार्यक्रम का प्रभावी संचालन छात्राओं साक्षी भास्कर एवं अंकिता विश्वकर्मा ने किया, जबकि आभार प्रदर्शन प्रो. राखी उइके ने व्यक्त किया।
इस अवसर पर डॉ. सुनील कुमार गोयल, प्रो. डॉ. कुलदीप सिंह फरे, डॉ. अर्चना मोरे, डॉ. परविंदर खनूजा, डॉ. शुचि गुप्ता, डॉ. संघमित्रा खातरकर, डॉ. कृष्णा सोलंकी, प्रो. प्रेम सिंह मोरे, प्रो. महेश भाबोर, डॉ. मोक्षदा चौधरी, प्रो. गजानंद भास्कले, प्रो. कुलदीप सिंह रावत, डॉ. शर्मिला मीणा, प्रो. कमलेश कोचले, प्रो. सीमा शुक्ला, डॉ. विकास उपाध्याय, दर्शनशास्त्र विभागाध्यक्ष प्रो. विपिन कुमार जैन सहित महाविद्यालय का समस्त प्राध्यापक वर्ग एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएँ उपस्थित रहे।
महर्षि सांदीपनि गुरु पर्व का यह आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, गुरु-शिष्य संबंध, नैतिक मूल्यों और संस्कारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का एक प्रेरक प्रयास सिद्ध हुआ। कार्यक्रम ने विद्यार्थियों को यह संदेश दिया कि जीवन में सफलता, चरित्र निर्माण और राष्ट्र निर्माण का सबसे सशक्त आधार गुरु का मार्गदर्शन और ज्ञान ही है।
