बड़वानी/खंडवा- मध्यप्रदेश वन विभाग में वनरक्षक से वनपाल पद पर हाल ही में की गई पदोन्नतियों को लेकर विवाद गहरा गया है। पदोन्नति प्रक्रिया में वरिष्ठता, आरक्षण नियमों और पात्र कर्मचारियों की अनदेखी के आरोप लगाते हुए जनप्रतिनिधियों और कर्मचारी संगठनों ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है। इस मामले में अब सांसद से लेकर कर्मचारी संगठनों तक ने मोर्चा खोल दिया है, जिससे वन विभाग की पदोन्नति प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
खरगोन-बड़वानी लोकसभा सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर वन वृत्त (क्षेत्रीय) खंडवा द्वारा जारी पदोन्नति आदेशों की समीक्षा कराने और नियमों के अनुरूप संशोधित आदेश जारी करने की मांग की है। वहीं, मध्यप्रदेश वन कर्मचारी संघ और आदिवासी कर्मचारी अधिकारी संगठन (आकासो) ने भी अलग-अलग ज्ञापन सौंपकर पदोन्नति प्रक्रिया में अनियमितताओं का आरोप लगाया है।
250 पदों पर पदोन्नति, 372 कर्मचारियों को मिलना था लाभ; नियमों के उल्लंघन के आरोपों से घिरा वन विभाग
मध्यप्रदेश वन विभाग के खंडवा वन वृत्त में वनरक्षक से वनपाल पद पर की गई लगभग 250 पदोन्नतियों को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जानकारी के अनुसार विभाग में कुल 372 कर्मचारियों की पदोन्नति प्रस्तावित थी, लेकिन केवल 250 कर्मचारियों को ही इसका लाभ दिया गया। आरोप है कि पूरी प्रक्रिया में मध्यप्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 का समुचित पालन नहीं किया गया। नियमों के अनुसार पदोन्नति में अनुसूचित जाति वर्ग को 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति वर्ग को 20 प्रतिशत तथा शेष पद अनारक्षित श्रेणी में निर्धारित प्रावधानों के अनुसार भरे जाने चाहिए थे। साथ ही वरिष्ठता एवं वरीयता के आधार पर अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग के पात्र कर्मचारियों को भी पदोन्नति सूची में शामिल किया जाना अनिवार्य था। आरोप है कि इसके विपरीत अनारक्षित श्रेणी में मुख्य रूप से सामान्य और अन्य पिछड़ा वर्ग के कर्मचारियों को लाभान्वित किया गया, जबकि कई वरिष्ठ और पात्र अनुसूचित जाति एवं जनजाति वर्ग के कर्मचारी पदोन्नति से वंचित रह गए। इस कथित अनियमितता को लेकर कर्मचारी संगठनों, जनप्रतिनिधियों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने इसे नियमों का खुला उल्लंघन बताते हुए पदोन्नति आदेशों की समीक्षा कर वरिष्ठता और आरक्षण नियमों के अनुरूप संशोधित सूची जारी करने की मांग की है।
सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि पदोन्नति सूची तैयार करते समय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण संबंधी प्रावधानों की अनदेखी की गई है। इसके साथ ही वरिष्ठ कर्मचारियों को दरकिनार कर कनिष्ठ कर्मचारियों को पदोन्नति देने के आरोप भी लगाए गए हैं।
वरिष्ठता और उपयुक्तता के सिद्धांत पर उठे प्रश्न
मध्यप्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 के उपनियम-11 में स्पष्ट प्रावधान है कि पदोन्नति वरिष्ठता सह उपयुक्तता के आधार पर की जानी चाहिए। लेकिन कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि वन वृत्त खंडवा द्वारा जारी आदेश में इस सिद्धांत का पालन नहीं किया गया।
वन कर्मचारी संघ का कहना है कि कई ऐसे वनरक्षक, जो वर्षों से सेवा में हैं और पदोन्नति के पात्र थे, उन्हें सूची से बाहर रखा गया, जबकि उनसे कनिष्ठ कर्मचारियों को पदोन्नति दे दी गई। इससे कर्मचारियों में असंतोष और नाराजगी बढ़ गई है।
वन कर्मचारी संघ ने जताई आपत्ति
मध्यप्रदेश वन कर्मचारी संघ, जिला इकाई बड़वानी ने मुख्य वन संरक्षक, खंडवा वृत्त को ज्ञापन सौंपकर पदोन्नति आदेशों पर पुनर्विचार की मांग की है। संघ का कहना है कि विभाग द्वारा जारी सूची में कई विसंगतियां हैं और यदि समय रहते इन्हें दूर नहीं किया गया तो इससे कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित होगा।
संघ ने मांग की है कि संपूर्ण वरिष्ठता सूची का पुनः परीक्षण कर नियमों के अनुरूप संशोधित पदोन्नति आदेश जारी किए जाएं, ताकि पात्र कर्मचारियों को न्याय मिल सके।
आदिवासी संगठन ने भी उठाई आवाज
आदिवासी कर्मचारी अधिकारी संगठन (आकासो) मध्यप्रदेश ने भी इस मामले को गंभीर बताते हुए शासन को ज्ञापन भेजा है। संगठन का आरोप है कि पदोन्नति प्रक्रिया में आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों के हितों की अनदेखी की गई है और आरक्षण संबंधी प्रावधानों का सही ढंग से पालन नहीं किया गया।
संगठन ने शासन से मांग की है कि पूरे मामले की जांच कर नियमों के अनुरूप नई पदोन्नति सूची जारी की जाए, ताकि किसी भी वर्ग के कर्मचारियों के साथ अन्याय न हो।
मुख्यमंत्री से हस्तक्षेप की मांग
सांसद गजेंद्र सिंह पटेल ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से इस पूरे मामले में हस्तक्षेप कर वन विभाग को आवश्यक निर्देश देने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा है कि यदि पदोन्नति प्रक्रिया में कोई त्रुटि हुई है तो उसे तत्काल सुधारा जाना चाहिए और सभी कर्मचारियों के साथ समान एवं न्यायपूर्ण व्यवहार सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
विभाग के सामने चुनौती
वन विभाग की यह पदोन्नति प्रक्रिया अब प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बन गई है। कर्मचारी संगठनों और जनप्रतिनिधियों की आपत्तियों के बाद विभाग पर दबाव बढ़ गया है कि वह पदोन्नति सूची की दोबारा समीक्षा करे।
फिलहाल, कर्मचारियों और संगठनों की निगाहें राज्य शासन और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर टिकी हैं। यदि समय रहते विवाद का समाधान नहीं हुआ, तो यह मामला और अधिक तूल पकड़ सकता है तथा विभागीय स्तर पर व्यापक विरोध प्रदर्शन की स्थिति भी बन सकती है।
वन विभाग की इस पदोन्नति विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सरकारी सेवाओं में पदोन्नति प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और नियमसम्मत है, और क्या पात्र कर्मचारियों को वास्तव में उनका अधिकार मिल पा रहा है।
