श्रीकृष्ण धरती के प्रथम राजकुमार, 16 कला संपूर्ण एवं सर्वगुण संपन्न स्वरूप के प्रतीक : राजेंद्र शुक्ल | ब्रह्माकुमारीज़ के जन्माष्टमी महोत्सव एवं शिक्षक सम्मान समारोह में उप मुख्यमंत्री ने कहा- श्रीकृष्ण के श्रेष्ठ गुणों को जीवन में धारण करना ही जन्माष्टमी का वास्तविक उद्देश्य

रीवा- ब्रह्माकुमारीज़ सब जोन रीवा द्वारा शांतिधाम, झिरिया में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी महोत्सव एवं शिक्षक सम्मान समारोह का भव्य और आध्यात्मिक आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप, भारतीय संस्कृति, श्रेष्ठ संस्कारों तथा राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मध्यप्रदेश के उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल रहे, जबकि अध्यक्षता लोकसभा सांसद जनार्दन मिश्र ने की।

समारोह को संबोधित करते हुए उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने कहा कि शिक्षक केवल विद्यार्थियों को पुस्तकीय ज्ञान देने का कार्य नहीं करते, बल्कि वे उनके जीवन को दिशा देने और श्रेष्ठ व्यक्तित्व एवं चरित्र का निर्माण करने वाले राष्ट्र निर्माता हैं। शिक्षा के साथ संस्कार, अनुशासन और चरित्र निर्माण भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि इन्हीं मूल्यों के आधार पर मजबूत समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है।

श्रीकृष्ण पवित्रता, प्रेम और श्रेष्ठ संस्कारों के प्रतीक

उप मुख्यमंत्री ने भगवान श्रीकृष्ण के आदर्श चरित्र का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति में श्रीकृष्ण श्रेष्ठ जीवन, पवित्रता, प्रेम, साहस और मर्यादा के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण का जीवन मानव समाज को सत्य, ज्ञान, शांति, आनंद और श्रेष्ठ संस्कारों की प्रेरणा देता है।

उन्होंने कहा कि श्रीकृष्ण को धरती के प्रथम राजकुमार के रूप में सतयुगी स्वर्णिम संसार की सम्पूर्णता का प्रतीक माना गया है। उनका स्वरूप सर्वगुण संपन्न, 16 कला संपूर्ण, पवित्र, निर्विकार, अहिंसक और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में वर्णित किया जाता है।

उप मुख्यमंत्री ने कहा कि जन्माष्टमी का उद्देश्य केवल भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाना नहीं है, बल्कि उनके जीवन से प्रेरणा लेकर पवित्रता, प्रेम, शांति, सत्य, ज्ञान और श्रेष्ठ संस्कारों को अपने जीवन में उतारना भी है।

शिक्षक ज्ञान के साथ संस्कारों का निर्माण करें

समारोह में शिक्षकों की भूमिका पर विशेष जोर देते हुए उप मुख्यमंत्री ने कहा कि आज के दौर में विद्यार्थियों को केवल शैक्षणिक ज्ञान देना पर्याप्त नहीं है। उनके भीतर मानवीय मूल्यों, संस्कारों, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना भी जरूरी है।

उन्होंने कहा कि एक शिक्षक का प्रभाव केवल कक्षा तक सीमित नहीं रहता। शिक्षक विद्यार्थियों के व्यक्तित्व और भविष्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए शिक्षकों का दायित्व है कि वे विद्यार्थियों को ज्ञान के साथ सही दिशा और संस्कार भी प्रदान करें।

उप मुख्यमंत्री ने ब्रह्माकुमारीज़ संस्था द्वारा आध्यात्मिक ज्ञान, संस्कार और सकारात्मक विचारों के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के प्रयासों की सराहना की।

शिक्षा का उद्देश्य श्रेष्ठ चरित्र का निर्माण : जनार्दन मिश्र

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे लोकसभा सांसद जनार्दन मिश्र ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति को श्रेष्ठ, चरित्रवान और संस्कारवान नागरिक बनाना है।

उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का जीवन मानव समाज को पवित्रता, प्रेम, सत्य, शांति और श्रेष्ठ मर्यादाओं को अपनाने की प्रेरणा देता है। उन्होंने शिक्षकों के योगदान को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि संस्कारवान पीढ़ी के निर्माण में शिक्षकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।

नन्ही प्रियांशी की योग प्रस्तुति ने मोहा मन

समारोह में ब्रह्माकुमारीज़ की संचालिका बीके लता दीदी ने भी श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के आध्यात्मिक महत्व पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने श्रीकृष्ण के जीवन और उनके गुणों को आत्मसात करने का संदेश दिया।

कार्यक्रम का विशेष आकर्षण 7 वर्षीय प्रियांशी सिंह की योग प्रस्तुति रही। नन्हीं प्रियांशी ने अपनी अद्भुत कला और प्रतिभा का प्रदर्शन करते हुए मनमोहक योग प्रस्तुति दी, जिसे उपस्थित अतिथियों और दर्शकों ने सराहा।

शिक्षकों का किया सम्मान

जन्माष्टमी महोत्सव के साथ आयोजित शिक्षक सम्मान समारोह में शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देने वाले शिक्षकों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर शिक्षा, संस्कार और समाज निर्माण में शिक्षकों की भूमिका के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई।

समारोह में नगर निगम नेता प्रतिपक्ष दीनानाथ वर्मा, नगर निगम अध्यक्ष वेंकटेश पांडे सहित अनेक गणमान्य नागरिक, शिक्षक, समाजसेवी एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे।

आध्यात्मिक संदेश के साथ संपन्न हुआ आयोजन

शांतिधाम, झिरिया में आयोजित यह समारोह भगवान श्रीकृष्ण के जीवन दर्शन और शिक्षक सम्मान को एक साथ जोड़ने वाला आयोजन रहा। कार्यक्रम में जहां श्रीकृष्ण के पवित्र एवं आदर्श स्वरूप पर चर्चा हुई, वहीं शिक्षकों के माध्यम से संस्कारवान और चरित्रवान समाज के निर्माण का संदेश भी दिया गया। समारोह ने यह संदेश दिया कि श्रेष्ठ समाज के निर्माण के लिए ज्ञान के साथ पवित्र विचार, संस्कार और मानवीय मूल्यों को जीवन में अपनाना आवश्यक है।

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