खंडवा- प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस, श्री नीलकंठेश्वर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय (एसएन कॉलेज), खंडवा में दर्शनशास्त्र विभाग एवं भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “महर्षि सांदीपनि गुरु पर्व” के अंतर्गत दो दिवसीय कार्यक्रम श्रद्धा, संस्कृति, ज्ञान और सामाजिक उत्तरदायित्व के संदेश के साथ गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। आयोजन ने भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा के गौरवशाली इतिहास को वर्तमान पीढ़ी से जोड़ते हुए शिक्षा, संस्कार, पर्यावरण संरक्षण और समाज सेवा के मूल्यों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी।
कार्यक्रम का उद्देश्य केवल गुरु पूर्णिमा का पारंपरिक उत्सव मनाना नहीं था, बल्कि विद्यार्थियों और शिक्षकों के मध्य गुरु-शिष्य संबंधों की गरिमा को सुदृढ़ करना, भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों का प्रसार करना तथा प्रकृति संरक्षण के प्रति समाज को जागरूक करना भी था। दो दिवसीय आयोजन में धार्मिक, सांस्कृतिक, प्रेरणात्मक और पर्यावरणीय गतिविधियों का समावेश किया गया, जिससे महाविद्यालय परिसर पूर्णतः आध्यात्मिक और सांस्कृतिक वातावरण से ओत-प्रोत दिखाई दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ भगवान नीलकंठेश्वर के पूजन एवं दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। इस अवसर पर महाविद्यालय परिवार ने शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ. गणेश प्रसाद दावरे एवं डॉ. प्रवीण कुमार पाटिल का शॉल एवं श्रीफल भेंट कर सम्मान किया। यह सम्मान भारतीय संस्कृति में गुरु के सर्वोच्च स्थान तथा शिक्षकों के प्रति आदर एवं कृतज्ञता का प्रतीक बना।

सम्मान उपरांत अपने प्रेरणादायी उद्बोधन में डॉ. गणेश प्रसाद दावरे ने कहा कि एक शिक्षक की वास्तविक पहचान उसके ज्ञान से अधिक उसकी संवेदनशीलता, समर्पण और विद्यार्थियों के प्रति उत्तरदायित्व से होती है। उन्होंने विशेष रूप से आर्थिक रूप से कमजोर एवं जरूरतमंद विद्यार्थियों के मार्गदर्शन और सहयोग को प्रत्येक शिक्षक का प्रथम दायित्व बताया। उन्होंने संस्कृत के प्रसिद्ध श्लोक—
“विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम्॥”
का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति के भीतर विनम्रता, पात्रता, नैतिकता और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है। उन्होंने विद्यार्थियों से आग्रह किया कि वे जीवन में केवल सफलता प्राप्त करने का लक्ष्य न रखें, बल्कि समाज को कुछ लौटाने का संकल्प भी लें।
महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. सोमपाल सिंह ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान ईश्वर के समान माना गया है। गुरु ही ज्ञान के माध्यम से व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण करता है और उसे जीवन के सही मार्ग पर अग्रसर करता है। उन्होंने विद्यार्थियों से अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, विश्वास और आजीवन सीखने की भावना बनाए रखने का आह्वान करते हुए कहा कि अनुशासन, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और संस्कार ही व्यक्ति को उत्कृष्ट नागरिक बनाते हैं तथा राष्ट्र निर्माण में उसकी सार्थक भूमिका सुनिश्चित करते हैं।
अपने विचार व्यक्त करते हुए डॉ. प्रवीण कुमार पाटिल ने कहा कि किसी भी संस्था की सफलता उसके समर्पित, सकारात्मक और सहयोगी कार्यदल पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि सामूहिक प्रयास, परस्पर विश्वास और लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता ही किसी भी संस्थान को उत्कृष्टता की ओर अग्रसर करती है। उन्होंने विद्यार्थियों को टीम भावना और नेतृत्व क्षमता विकसित करने की प्रेरणा भी दी।

कार्यक्रम के दूसरे दिन गुरु पूर्णिमा के अवसर पर “एक पेड़ गुरु के नाम” अभियान के अंतर्गत महाविद्यालय परिसर में वृक्षारोपण किया गया। इस अवसर पर शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने पौधे रोपकर उनके संरक्षण का संकल्प लिया। आयोजन के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि जिस प्रकार गुरु ज्ञान देकर जीवन को समृद्ध बनाते हैं, उसी प्रकार वृक्ष प्रकृति और मानव जीवन के आधार हैं। पर्यावरण संरक्षण को गुरु के प्रति सम्मान से जोड़ते हुए यह अभियान सभी के लिए प्रेरणास्रोत बना।
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर महाविद्यालय परिसर में प्रातःकाल से ही श्रद्धालुओं एवं जनसामान्य के बीच संत श्री दादाजी धूनीवाले के सम्मान में प्रसाद का वितरण भी किया गया। इस सेवा कार्य ने समाज में समरसता, सेवा और परोपकार की भावना को और अधिक सुदृढ़ किया।
कार्यक्रम के दौरान मध्यप्रदेश शासन द्वारा आयोजित महर्षि सांदीपनि गुरुपूर्णिमा पर्व का लाइव प्रसारण भी महाविद्यालय में देखा गया, जिसमें प्राध्यापकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। इस प्रसारण के माध्यम से गुरु-शिष्य परंपरा के ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से समझने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के समापन अवसर पर डॉ. अर्चना मोरे ने सभी अतिथियों, प्राध्यापकों, विद्यार्थियों, कर्मचारियों एवं आयोजन में सहयोग देने वाले सभी लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजन विद्यार्थियों में भारतीय संस्कृति, नैतिक मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
दो दिवसीय “महर्षि सांदीपनि गुरु पर्व” केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, गुरु-शिष्य परंपरा, सेवा, संस्कार और प्रकृति संरक्षण के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने वाला प्रेरणादायी उत्सव सिद्ध हुआ। इस आयोजन ने विद्यार्थियों और शिक्षकों को यह संदेश दिया कि ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह समाज, संस्कृति और प्रकृति के संरक्षण के साथ मानवता के कल्याण में योगदान दे। यही भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल दर्शन है और यही महर्षि सांदीपनि की शिक्षाओं का वास्तविक संदेश भी है।
