विशेष संवाददाता- प्रदेश के एक महत्वपूर्ण विभाग में इन दिनों प्रमोशन और पदस्थापना की प्रक्रिया जितनी तेजी से आगे बढ़ रही है, उससे कहीं अधिक तेजी से विभागीय गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है। कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच यह चर्चा जोरों पर है कि मनचाही पोस्टिंग दिलाने के नाम पर कथित रूप से भारी लेन-देन का खेल चल रहा है। हालांकि इन आरोपों की अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभाग के अंदर इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं और कयास लगाए जा रहे हैं।
सूत्रों के अनुसार, विभाग के शीर्ष स्तर पर बैठे एक प्रभावशाली अधिकारी को लेकर यह चर्चा है कि पसंदीदा स्थानों पर पदस्थापना के लिए कथित तौर पर “रेट” तय किए जा रहे हैं। विभागीय हलकों में यह भी कहा जा रहा है कि जिन अधिकारियों और कर्मचारियों ने मनचाही जगह पर पोस्टिंग हासिल की है, वे इस व्यवस्था से संतुष्ट दिखाई दे रहे हैं, जबकि बाकी लोग पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं।
इन चर्चाओं को और हवा तब मिली जब विभाग के भीतर यह दावा किया जाने लगा कि कथित तौर पर जुटाई जा रही रकम का संबंध आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों से है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि शीर्ष अधिकारी अपने एक करीबी रिश्तेदार को विधानसभा चुनाव लड़ाने की तैयारी में जुटे हैं और इसके लिए बड़े पैमाने पर आर्थिक संसाधन जुटाए जाने की बातें की जा रही हैं। हालांकि इस दावे के समर्थन में कोई आधिकारिक दस्तावेज या प्रमाण सामने नहीं आए हैं।
विभाग के कर्मचारियों के बीच यह भी चर्चा है कि चुनाव लड़ना आज के दौर में अत्यंत खर्चीला माना जाता है और इसी कारण कथित रूप से प्रमोशन और पोस्टिंग की प्रक्रिया को आर्थिक संसाधन जुटाने का माध्यम बनाया जा रहा है। विभागीय गलियारों में “खोखा” जैसे शब्द भी खुलेआम चर्चा का विषय बना हुआ हैं।
सूत्रों का दावा है कि पूरी प्रमोशन और पोस्टिंग प्रक्रिया में विभाग के ‘कप्तान’ को लगभग पूरी तरह से दरकिनार रखा गया। विभागीय चर्चाओं के अनुसार, महत्वपूर्ण फैसले उनके स्तर पर न होकर किसी अन्य स्तर से लिए गए, जबकि औपचारिक जिम्मेदारी का बोझ अंततः उन्हीं के कंधों पर डालने की कोशिश की गई। इसको लेकर विभाग के भीतर तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। हालांकि, इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही संबंधित अधिकारियों की ओर से कोई प्रतिक्रिया सामने आई है।
फिलहाल इन सभी चर्चाओं और आरोपों पर विभाग की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। न ही किसी सक्षम एजेंसी द्वारा इस संबंध में किसी जांच की पुष्टि हुई है। ऐसे में इन दावों को फिलहाल विभागीय चर्चाओं और सूत्रों से प्राप्त जानकारी के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
यदि भविष्य में इस मामले में कोई आधिकारिक जांच, दस्तावेज या संबंधित पक्ष का बयान सामने आता है, तो स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकेगी। तब तक विभाग में प्रमोशन, पोस्टिंग और कथित चुनावी फंडिंग को लेकर चल रही चर्चाएं कर्मचारियों के बीच सबसे बड़ा विषय बनी हुई हैं।
(अस्वीकरण: यह लेख विभागीय सूत्रों और चर्चाओं पर आधारित है।)
