खंडवा- जिले के रूस्तमपुर स्थित मेसर्स प्रेरणा कृषि सेवा केन्द्र के खिलाफ उर्वरक विक्रय एवं भंडारण में अनियमितता पाए जाने पर पंधाना थाने में एफआईआर दर्ज होने के बाद पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। एक ओर कृषि विभाग इस कार्रवाई को किसानों के हित में सख्त कदम बता रहा है, वहीं दूसरी ओर सवाल उठ रहे हैं कि जब किसान पूरे सीजन में खाद के लिए परेशान रहे, तब विभाग ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की?
उप संचालक कृषि श्री नितेश यादव के अनुसार, उर्वरक निरीक्षक एवं वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी श्री जितेन्द्र सिंह दादौरिया द्वारा किए गए निरीक्षण में पाया गया कि संबंधित फर्म उर्वरक नियंत्रण आदेश, 1985 की विभिन्न धाराओं और आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के प्रावधानों का पालन नहीं कर रही थी। जांच के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि पीओएस मशीन में यूरिया के 1102 बैग उपलब्ध दर्शाए जा रहे थे, जबकि प्रतिष्ठान में वास्तविक स्टॉक शून्य मिला।
सबसे बड़ा सवाल – इतनी बड़ी गड़बड़ी आखिर कब से चल रही थी?
यदि डिजिटल रिकॉर्ड में 1102 बैग यूरिया उपलब्ध दिख रहा था और मौके पर एक भी बैग नहीं मिला, तो यह कोई साधारण त्रुटि नहीं मानी जा सकती। इससे यह आशंका पैदा होती है कि कहीं न कहीं उर्वरक वितरण प्रणाली में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं।
किसानों का कहना है कि पिछले कई सप्ताह से वे खाद के लिए परेशान थे। कई स्थानों पर लंबी कतारें लगीं, किसानों को कई-कई बार केंद्रों के चक्कर लगाने पड़े और अनेक किसानों को समय पर उर्वरक नहीं मिल सका। ऐसे में अब एफआईआर दर्ज होने के बाद लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या विभाग को यह अनियमितता पहले दिखाई नहीं दी, या फिर कार्रवाई में अनावश्यक देरी हुई?
किसानों की नाराजगी – “जब जरूरत थी, तब कार्रवाई क्यों नहीं?”
किसानों के बीच यह चर्चा तेज है कि यदि विभाग ने समय रहते निरीक्षण और निगरानी की होती, तो खाद की किल्लत को काफी हद तक रोका जा सकता था। कई किसानों का आरोप है कि पूरे सीजन में उन्हें समय पर उर्वरक नहीं मिला, जिससे बुवाई और फसल प्रबंधन प्रभावित हुआ।
कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि खरीफ सीजन में यूरिया और अन्य उर्वरकों की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। ऐसे समय में किसी भी प्रकार की अनियमितता सीधे किसानों की उत्पादन क्षमता और आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है।
जवाबदेही का सवाल
इस पूरे मामले में केवल एक उर्वरक विक्रेता की भूमिका की जांच पर्याप्त नहीं मानी जा रही। यह भी आवश्यक है कि यह पता लगाया जाए कि—
- क्या संबंधित प्रतिष्ठान की नियमित निगरानी की जा रही थी?
- विभागीय स्तर पर स्टॉक की समीक्षा समय-समय पर हुई या नहीं?
- यदि किसानों की शिकायतें पहले से थीं, तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- क्या जिले के अन्य उर्वरक विक्रेताओं के यहां भी इसी प्रकार की अनियमितताएं हो सकती हैं?
पूरे जिले में विशेष जांच की मांग
इस घटना के बाद किसानों और सामाजिक संगठनों ने जिले के सभी उर्वरक विक्रेताओं की विशेष जांच कराने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यदि एक प्रतिष्ठान में इतनी बड़ी विसंगति सामने आई है, तो अन्य स्थानों पर भी जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाना जरूरी है।
कार्रवाई से अधिक जरूरी है समय पर निगरानी
किसानों का मानना है कि एफआईआर दर्ज होना स्वागत योग्य कदम है, लेकिन इससे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह कार्रवाई समय पर हुई? यदि अनियमितताओं पर पहले अंकुश लगाया जाता, तो किसानों को खाद के लिए भटकना नहीं पड़ता।
निष्कर्ष
रूस्तमपुर के उर्वरक विक्रेता पर दर्ज एफआईआर ने केवल एक प्रतिष्ठान की कार्यप्रणाली पर नहीं, बल्कि पूरे उर्वरक वितरण और निगरानी तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब किसानों की नजर इस बात पर है कि जांच कितनी निष्पक्ष होती है, दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए प्रशासन क्या ठोस कदम उठाता है।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है – जब किसान पूरे सीजन में खाद के लिए परेशान रहे, तब कृषि विभाग की नींद आखिर इतनी देर से क्यों खुली?
