अल नीनो की चुनौती के बीच कृषि सुरक्षा का राष्ट्रीय रोडमैप: हर सप्ताह समीक्षा, वैज्ञानिक रणनीति और किसानों के लिए बहु-स्तरीय सुरक्षा कवच

नई दिल्ली- बदलती जलवायु परिस्थितियों और संभावित अल नीनो के प्रभाव के कारण इस वर्ष मानसून को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच केंद्र सरकार ने कृषि क्षेत्र को सुरक्षित रखने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने मौसम की चुनौती को केवल प्राकृतिक घटना मानकर छोड़ने के बजाय वैज्ञानिक योजना, नियमित निगरानी और त्वरित प्रशासनिक कार्रवाई के माध्यम से किसानों के हितों की रक्षा का व्यापक अभियान शुरू किया है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं प्रत्येक सप्ताह उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक कर देशभर में वर्षा, खरीफ बुवाई, बीज उपलब्धता और फसल की स्थिति की लगातार निगरानी कर रहे हैं।

हाल के वर्षों में जलवायु परिवर्तन ने भारतीय कृषि के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। अल नीनो जैसी वैश्विक मौसमी घटनाएं मानसून की गति और वितरण को प्रभावित करती हैं, जिसका सीधा असर किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा पर पड़ता है। इसी कारण इस बार केंद्र सरकार ने मानसून शुरू होने से पहले ही व्यापक तैयारी प्रारंभ कर दी थी।

जून की कमी, जुलाई में सुधार के संकेत

श्री शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के बाद बताया कि जून महीने में देशभर में सामान्य से लगभग 33 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई थी, जिससे खरीफ बुवाई प्रभावित हुई। हालांकि जुलाई के शुरुआती दिनों में कई राज्यों में अच्छी वर्षा होने से स्थिति में उल्लेखनीय सुधार आया है और वर्षा की कमी घटकर 24 प्रतिशत रह गई है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि कम वर्षा वाले जिलों की संख्या 262 से घटकर 178 रह गई है। सरकार का मानना है कि यदि जुलाई में मानसून की सक्रियता इसी प्रकार बनी रहती है तो खरीफ सीजन काफी हद तक सामान्य हो सकता है।

इन राज्यों पर विशेष नजर

केंद्र सरकार ने उन राज्यों की पहचान की है जहां मानसून की स्थिति का कृषि पर अधिक प्रभाव पड़ सकता है। इनमें मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पंजाब, पश्चिम बंगाल और ओडिशा प्रमुख हैं। इन राज्यों में मौसम, वर्षा, जलाशयों की स्थिति, बुवाई और फसल विकास पर प्रतिदिन निगरानी रखी जा रही है।

खरीफ बुवाई में कमी, लेकिन विकल्प तैयार

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि अभी तक देश में 350.85 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई है, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 91.95 लाख हेक्टेयर कम है। मानसून की देरी का सबसे अधिक असर सोयाबीन और कपास जैसी फसलों पर पड़ा है।

ऐसी स्थिति में कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को केवल इंतजार करने के बजाय परिस्थितियों के अनुरूप खेती करने की सलाह दी है। सरकार किसानों को मक्का, बाजरा, मूंग जैसी कम अवधि में तैयार होने वाली और अपेक्षाकृत कम पानी की आवश्यकता वाली फसलों की बुवाई के लिए प्रोत्साहित कर रही है। इससे किसानों का जोखिम कम होगा और उत्पादन बनाए रखने में मदद मिलेगी।

अप्रैल से शुरू हुई थी तैयारी

श्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि केंद्र सरकार ने संभावित चुनौतियों को देखते हुए अप्रैल माह से ही तैयारी प्रारंभ कर दी थी। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के वैज्ञानिकों के सहयोग से संभावित प्रभावित जिलों के लिए कंटिंजेंसी प्लान तैयार किए गए और राज्यों के साथ साझा किए गए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर तत्काल वैकल्पिक कृषि रणनीति लागू की जा सके।

यह योजना केवल कागजों तक सीमित नहीं रही, बल्कि राज्यों के कृषि विभागों और वैज्ञानिक संस्थानों के माध्यम से किसानों तक भी पहुंचाई गई।

‘खेत बचाओ अभियान’ बना जन-जागरूकता का माध्यम

मानसून की चुनौती से निपटने के लिए जून माह में देशव्यापी “खेत बचाओ अभियान” चलाया गया। इस अभियान के तहत 1.24 लाख से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए और 80 लाख से अधिक किसानों तक सीधे पहुंचकर उन्हें मौसम आधारित कृषि प्रबंधन, वैकल्पिक फसल चयन, जल संरक्षण तथा आधुनिक खेती की जानकारी दी गई।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे जागरूकता अभियानों से किसानों को समय पर सही निर्णय लेने में मदद मिलती है और प्राकृतिक जोखिम का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।

बीज की कमी नहीं होने देगी सरकार

यदि किसी क्षेत्र में दोबारा बुवाई की आवश्यकता पड़े तो किसानों को बीज की कमी का सामना न करना पड़े, इसके लिए केंद्र सरकार ने 1.75 लाख क्विंटल राष्ट्रीय बीज भंडार तैयार रखा है। आवश्यकता पड़ने पर राज्यों को तुरंत बीज उपलब्ध कराए जाएंगे ताकि कृषि कार्य बाधित न हो।

यह व्यवस्था विशेष रूप से उन क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है जहां पहली बुवाई वर्षा की कमी के कारण प्रभावित हो सकती है।

किसान क्रेडिट कार्ड और फसल बीमा पर विशेष जोर

कृषि संकट के समय किसानों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के लिए किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) अभियान को भी तेज किया गया है। 30 जून तक प्राप्त 1.14 लाख आवेदनों में से 94 हजार से अधिक स्वीकृत किए जा चुके हैं।

इसके साथ ही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के तहत अधिक से अधिक किसानों को जोड़ने का अभियान चलाया जा रहा है ताकि प्राकृतिक आपदा, कम वर्षा या फसल नुकसान की स्थिति में किसानों को आर्थिक सुरक्षा मिल सके।

24 घंटे सक्रिय है मॉनिटरिंग सिस्टम

केंद्रीय मंत्री ने बताया कि अल नीनो मॉनिटरिंग सेल, क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप, राज्य स्तरीय कंट्रोल रूम तथा विभिन्न मंत्रालयों के अधिकारी लगातार मौसम, वर्षा, बुवाई, फसल और बाजार की स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं।

इस निगरानी व्यवस्था के कारण किसी भी राज्य में स्थिति बिगड़ने पर तुरंत आवश्यक निर्णय लिए जा सकते हैं और किसानों को समय पर राहत उपलब्ध कराई जा सकती है।

जलवायु परिवर्तन के दौर में नई कृषि नीति की झलक

विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम के इस दौर में केवल अच्छी बारिश पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिक खेती, जल संरक्षण, मौसम आधारित फसल चयन, आधुनिक बीज, बीमा सुरक्षा और डिजिटल मॉनिटरिंग जैसे उपाय ही भविष्य की कृषि को सुरक्षित बना सकते हैं। केंद्र सरकार की वर्तमान रणनीति इसी सोच को आगे बढ़ाती दिखाई देती है।

अल नीनो की संभावित चुनौती के बीच केंद्र सरकार का यह दृष्टिकोण केवल संकट आने के बाद राहत देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पहले से तैयारी, वैज्ञानिक योजना, संसाधनों की उपलब्धता और सतत निगरानी पर आधारित है। जुलाई में मानसून की स्थिति में सुधार से किसानों को राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है। यदि आने वाले दिनों में वर्षा सामान्य रहती है तो खरीफ सीजन में आई शुरुआती सुस्ती की भरपाई संभव हो सकती है। सरकार का दावा है कि किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादन को सुरक्षित रखने के लिए हर स्तर पर समन्वित और समयबद्ध प्रयास जारी रहेंगे।

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