खंडवा- भारत की सांस्कृतिक विविधता और लोक परंपराओं की समृद्ध विरासत को संरक्षित रखने में लोक कलाकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। मध्यप्रदेश के निमाड़ अंचल की लोक संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाने वाली वरिष्ठ लोक कलाकार साधना उपाध्याय ने एक बार फिर क्षेत्र का नाम गौरवान्वित किया है। राष्ट्रपति भवन में आयोजित प्रतिष्ठित चतुरंग कार्यक्रम में उन्होंने अपने सहयोगियों हेमंत उपाध्याय एवं गौरी काजवे के साथ पारंपरिक गणगौर नृत्य की प्रस्तुति देकर निमाड़ की सांस्कृतिक पहचान को देश के सर्वोच्च संवैधानिक मंच पर स्थापित किया।
17 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति भवन में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में देश के विभिन्न क्षेत्रों की लोक एवं शास्त्रीय कलाओं का प्रदर्शन किया गया। इस अवसर पर साधना उपाध्याय और उनकी टीम ने निमाड़ की परंपरागत लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हुए गणगौर नृत्य प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति ने न केवल उपस्थित दर्शकों का मन मोह लिया, बल्कि निमाड़ की सांस्कृतिक समृद्धि और लोक जीवन की झलक भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित की।
छठवीं बार मिला राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुति का अवसर
समाजसेवी सुनील जैन ने जानकारी देते हुए बताया कि यह छठवीं बार है जब साधना उपाध्याय एवं उनकी टीम को महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष गणगौर नृत्य प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त हुआ है। किसी लोक कलाकार के लिए देश के सर्वोच्च पद पर आसीन राष्ट्रपति के समक्ष बार-बार प्रस्तुति देना स्वयं में एक असाधारण उपलब्धि है। यह सम्मान न केवल साधना उपाध्याय की कला साधना का परिणाम है, बल्कि निमाड़ की लोक परंपराओं की राष्ट्रीय स्वीकार्यता का भी प्रमाण है।
गणगौर: संस्कृति, श्रद्धा और लोक जीवन का प्रतीक
गणगौर केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में नारी श्रद्धा, सौभाग्य और पारिवारिक समृद्धि का प्रतीक है। राजस्थान और मालवा-निमाड़ क्षेत्र में यह पर्व विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। गणगौर नृत्य के माध्यम से लोक जीवन की भावनाएं, सामाजिक परंपराएं और सांस्कृतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति होती है। साधना उपाध्याय वर्षों से इस परंपरा को जीवंत बनाए रखने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य कर रही हैं।
कई राष्ट्रपतियों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बिखेर चुकी हैं कला की छटा
साधना उपाध्याय की कला यात्रा केवल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक सीमित नहीं है। इससे पूर्व वे तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम तथा रामनाथ कोविंद के समक्ष भी गणगौर नृत्य प्रस्तुत कर चुकी हैं। उनकी प्रस्तुतियों ने हर बार निमाड़ की लोक संस्कृति को नई पहचान दिलाई है।
इतना ही नहीं, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारतीय लोक संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया है। केन्या के राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुति देकर उन्होंने विदेशों में भी निमाड़ी लोक कला की विशिष्ट पहचान स्थापित की। यह उपलब्धि बताती है कि स्थानीय संस्कृति में भी वैश्विक स्तर पर लोगों को आकर्षित करने की अपार क्षमता होती है।
राष्ट्रपति भवन में मिला विशेष सम्मान
चतुरंग कार्यक्रम में प्रस्तुति के पश्चात राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से सभी कलाकारों के सम्मान में स्नेह भोज का आयोजन किया गया। कलाकारों के लिए यह केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि उनकी कला और समर्पण के प्रति राष्ट्र के सम्मान का प्रतीक था। राष्ट्रपति भवन में मिला यह सम्मान कलाकारों के लिए जीवनभर याद रहने वाला अनुभव बन गया।
निमाड़ की सांस्कृतिक पहचान को मिली नई ऊंचाई
साधना उपाध्याय की यह उपलब्धि केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि पूरे निमाड़ अंचल की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है। उनकी प्रस्तुतियों के माध्यम से निमाड़ की पारंपरिक कला, लोकगीत, लोकनृत्य और सांस्कृतिक मूल्य देश के महत्वपूर्ण मंचों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे कलाकार स्थानीय संस्कृति को जीवित रखने के साथ-साथ उसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने का भी महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं।
राष्ट्रपति भवन में छठवीं बार गणगौर नृत्य की प्रस्तुति देकर साधना उपाध्याय ने यह सिद्ध कर दिया है कि समर्पण, साधना और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता के बल पर किसी भी क्षेत्र की लोक कला राष्ट्रीय पहचान प्राप्त कर सकती है। उनकी यह उपलब्धि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है और निमाड़ की सांस्कृतिक धरोहर के लिए गर्व का विषय भी।
