प्राकृतिक खेती और गौसंरक्षण का प्रेरक केंद्र बना बसामन मामा गौवंश वन्य विहार, उप मुख्यमंत्री राजेंद्र शुक्ल ने किया निरीक्षण

भोपाल- मध्यप्रदेश में प्राकृतिक खेती, जैविक कृषि और गौसंरक्षण को नई दिशा देने की पहल लगातार मजबूत हो रही है। इसी क्रम में उप मुख्यमंत्री ने बुधवार को बसामन मामा गौवंश वन्य विहार का दौरा कर वहां संचालित प्राकृतिक खेती, गौसंरक्षण और कृषि नवाचारों का विस्तृत निरीक्षण किया। उन्होंने परिसर में विकसित विभिन्न कृषि मॉडल, गौवंश के लिए तैयार की जा रही आधारभूत सुविधाओं तथा पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से उगाई गई हरी सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों का अवलोकन करते हुए इसे किसानों के लिए एक आदर्श सीखने का केंद्र बताया।

प्राकृतिक खेती का सफल और अनुकरणीय मॉडल

निरीक्षण के दौरान उप मुख्यमंत्री ने कहा कि बसामन मामा गौवंश वन्य विहार प्राकृतिक खेती का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। यहां सीमित भूमि पर मल्टी-लेयर (बहुस्तरीय) खेती अपनाकर कृषि की उत्पादकता बढ़ाई गई है। इस पद्धति में जमीन की निचली परत में हल्दी, अदरक और प्याज जैसी फसलें उगाई जा रही हैं, जबकि ऊपरी स्तर पर लौकी, तोरई, कद्दू, करेला, खीरा, भिंडी और बैंगन जैसी सब्जियों की खेती की जा रही है। इससे कम क्षेत्र में अधिक उत्पादन प्राप्त हो रहा है और किसानों को अतिरिक्त आय का अवसर मिल रहा है।

रासायनिक खादों से पूरी तरह मुक्त खेती

उप मुख्यमंत्री श्री शुक्ल ने बताया कि इस पूरे कृषि मॉडल में डीएपी, यूरिया अथवा किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक का उपयोग नहीं किया जाता। खेती पूरी तरह प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित है, जिससे तैयार होने वाली सब्जियां और अन्य कृषि उत्पाद विषमुक्त हैं। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी है। रासायनिक अवशेषों से मुक्त खाद्य पदार्थ लोगों को बेहतर स्वास्थ्य प्रदान करते हैं और अनेक बीमारियों के जोखिम को कम करते हैं।

गौवंश संरक्षण से आत्मनिर्भर कृषि व्यवस्था

बसामन मामा गौवंश वन्य विहार में वर्तमान में लगभग 9 हजार बेसहारा गौवंश का संरक्षण एवं संवर्धन किया जा रहा है। यहां उपलब्ध गोबर और गोमूत्र का उपयोग प्राकृतिक खेती की रीढ़ माने जाने वाले जैविक उत्पादों के निर्माण में किया जा रहा है। गोबर और गोमूत्र से बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसे प्राकृतिक उर्वरक एवं जैविक कीटनाशक तैयार किए जाते हैं, जिनसे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और फसलें बिना रासायनिक दवाओं के सुरक्षित रहती हैं।

कृषि विविधीकरण पर विशेष जोर

वन्य विहार परिसर में केवल सब्जियों तक ही खेती सीमित नहीं है, बल्कि यहां गेहूं, धान और मूंग जैसी पारंपरिक फसलों के साथ-साथ बागवानी को भी बढ़ावा दिया गया है। बड़े पैमाने पर फलदार वृक्ष लगाए गए हैं, जिससे कृषि विविधीकरण को प्रोत्साहन मिल रहा है और किसानों के लिए आय के नए स्रोत विकसित हो रहे हैं।

किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने का आह्वान

उप मुख्यमंत्री श्री राजेंद्र शुक्ल ने किसानों से बसामन मामा गौवंश वन्य विहार का भ्रमण करने और यहां अपनाई जा रही तकनीकों को सीखने की अपील की। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती अपनाकर किसान अपनी उत्पादन लागत कम कर सकते हैं, मिट्टी की उर्वरा शक्ति को सुरक्षित रख सकते हैं और बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद तैयार कर अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि देश में प्राकृतिक खेती का दायरा बढ़ता है तो रासायनिक उर्वरकों के आयात पर होने वाला खर्च कम होगा, जिससे देश की विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी।

सतत कृषि और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल

उप मुख्यमंत्री ने कहा कि प्राकृतिक खेती केवल खेती की एक पद्धति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वस्थ मिट्टी, स्वच्छ पर्यावरण और सुरक्षित खाद्य प्रणाली सुनिश्चित करने का माध्यम है। उन्होंने वन्य विहार में कार्यरत अधिकारियों, कर्मचारियों और प्रबंधन की सराहना करते हुए कहा कि उनके प्रयासों से यह परिसर प्राकृतिक खेती, गौसंरक्षण और आत्मनिर्भर कृषि का प्रेरक मॉडल बनकर उभरा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यहां विकसित अनुभव और तकनीक प्रदेश के हजारों किसानों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध होगी।

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