नई दिल्ली/खंडवा- स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति भवन में आयोजित पारंपरिक ‘एट होम’ समारोह में देश की विविध सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम देखने को मिला। इस गरिमामय आयोजन में मध्य प्रदेश की समृद्ध लोक एवं जनजातीय कला परंपराओं को भी विशेष स्थान मिला। मालवा-निमाड़ की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत करते हुए खंडवा की साधना हेमंत उपाध्याय ने पारंपरिक निमाड़ी गणगौर की प्रस्तुति दी।
राष्ट्रपति भवन जैसे प्रतिष्ठित राष्ट्रीय मंच पर निमाड़ की गणगौर का पहुंचना खंडवा और पूरे निमाड़ अंचल के लिए गौरव का विषय रहा। साधना हेमंत उपाध्याय ने इस अवसर को मां गणगौर की कृपा बताते हुए कहा कि निमाड़ की परंपरा को लेकर नई दिल्ली पहुंचना उनके लिए अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण क्षण है।
‘जय हिंद, जय गणगौर मां’ के साथ व्यक्त की भावनाएं
साधना हेमंत उपाध्याय ने कहा— “जय हिंद, जय गणगौर मां। सादर प्रणाम। गणगौर मां की कृपा बनी है कि निमाड़ की गणगौर लेकर नई दिल्ली आने का अवसर मिला।”
उनकी यह भावना निमाड़ की लोक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा के प्रति गहरे जुड़ाव को दर्शाती है। गणगौर की यह प्रस्तुति केवल एक कलात्मक प्रदर्शन नहीं, बल्कि निमाड़ की मिट्टी, लोकविश्वास और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं को देश के सर्वोच्च संवैधानिक परिसर तक पहुंचाने का अवसर रही।
राष्ट्रपति भवन में मालवा-निमाड़ की सांस्कृतिक छटा
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति भवन में आयोजित ‘एट होम’ समारोह में मध्य प्रदेश की विभिन्न लोक एवं जनजातीय कलाओं को प्रदर्शित किया गया। मालवा-निमाड़ की परंपरा, भील और गोंड कला तथा प्रसिद्ध बाघ प्रिंट जैसी कला शैलियों ने समारोह की सांस्कृतिक गरिमा बढ़ाई।
भारत की विविधता को दर्शाने वाले इस आयोजन में विभिन्न राज्यों की कला, शिल्प और पारंपरिक जीवनशैली को स्थान दिया गया। ऐसे में निमाड़ की गणगौर ने मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक पहचान को एक विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया।
गणगौर : निमाड़ की लोक आस्था और सांस्कृतिक पहचान
निमाड़ में गणगौर केवल एक पर्व नहीं, बल्कि लोक जीवन से गहराई से जुड़ी सांस्कृतिक परंपरा है। गणगौर से जुड़े गीत, पूजा-पद्धति, लोक शिल्प और पारंपरिक स्वरूप क्षेत्र की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हैं।
निमाड़ी संस्कृति में लोक देवी-देवताओं के प्रति आस्था के साथ-साथ पारंपरिक कलाओं और सामुदायिक सहभागिता की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। गणगौर की इसी जीवंत परंपरा को राष्ट्रपति भवन तक पहुंचाना स्थानीय संस्कृति को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
जनजातीय कला के साथ लोक परंपराओं का संगम
राष्ट्रपति भवन में आयोजित कार्यक्रम में मध्य प्रदेश की जनजातीय कला को भी प्रमुखता दी गई। भील और गोंड कला के रंगों के साथ पारंपरिक शिल्प और डिजाइन की विविधता ने अतिथियों का ध्यान आकर्षित किया।
मध्य प्रदेश की कला परंपराओं में आदिवासी चित्रकला, पारंपरिक शिल्प और कपड़ा कला का विशेष महत्व है। वहीं निमाड़ की लोक परंपराएं इस सांस्कृतिक विरासत को एक अलग पहचान देती हैं। इन सभी कलाओं का एक राष्ट्रीय मंच पर प्रदर्शन मध्य प्रदेश की बहुरंगी सांस्कृतिक पहचान को सामने लाता है।
खंडवा के लिए गौरव का क्षण
साधना हेमंत उपाध्याय द्वारा राष्ट्रपति भवन में निमाड़ की गणगौर की प्रस्तुति खंडवा जिले के लिए भी विशेष उपलब्धि है। खंडवा और निमाड़ क्षेत्र अपनी समृद्ध लोक संस्कृति, लोकगीतों, परंपराओं और जनजातीय विरासत के लिए जाना जाता है।
राष्ट्रपति भवन में निमाड़ की सांस्कृतिक परंपरा की मौजूदगी ने यह साबित किया कि स्थानीय लोक कला और परंपराओं में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने की पूरी क्षमता है। ऐसे अवसर स्थानीय कलाकारों और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े लोगों के लिए नई प्रेरणा भी प्रदान करते हैं।
‘एट होम’ समारोह में दिखी भारत की सांस्कृतिक विविधता
स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रपति भवन में होने वाला ‘एट होम’ समारोह देश की लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक गरिमा का महत्वपूर्ण आयोजन है। इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों की कला एवं सांस्कृतिक परंपराओं को स्थान मिलना भारत की ‘विविधता में एकता’ की भावना को मजबूत करता है।
इस बार भी मध्य प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों की लोक एवं पारंपरिक कलाओं को समारोह में स्थान दिया गया। अलग-अलग क्षेत्रों की कला शैलियों, शिल्प और सांस्कृतिक प्रतीकों ने आयोजन को विशेष आकर्षण प्रदान किया।
नई दिल्ली पहुंची निमाड़ की पहचान
खंडवा की साधना हेमंत उपाध्याय द्वारा प्रस्तुत निमाड़ की गणगौर ने स्वतंत्रता दिवस के इस राष्ट्रीय समारोह में क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को नई दिल्ली तक पहुंचाया। यह अवसर केवल एक कलाकार की उपलब्धि नहीं, बल्कि निमाड़ की लोक परंपरा, कारीगरों, कलाकारों और उन सभी परिवारों के लिए गौरव का क्षण है, जिन्होंने वर्षों से इन परंपराओं को जीवित रखा है।
राष्ट्रपति भवन में गणगौर की मौजूदगी ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि भारत की वास्तविक सांस्कृतिक शक्ति उसके गांवों, कस्बों और अंचलों में जीवित लोक परंपराओं में बसती है। निमाड़ की गणगौर का राष्ट्रीय मंच तक पहुंचना इसी जीवंत विरासत की खूबसूरत मिसाल बनकर सामने आया।
