हरसूद- वर्षों पहले विकास परियोजनाओं के कारण अपने पैतृक गांव, खेत-खलिहान और आजीविका से विस्थापित हुए हरसूद क्षेत्र के लोगों ने एक बार फिर अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर आवाज बुलंद की है। गुरुवार को आयोजित “हरसूद अधिकार एवं रोजगार पदयात्रा” में बड़ी संख्या में विस्थापित परिवारों, युवाओं और ग्रामीणों ने भाग लेकर अपनी लंबित मांगों को सरकार तक पहुंचाने का प्रयास किया। पदयात्रा फीलगूड चौराहे से प्रारंभ होकर एसडीएम कार्यालय पहुंची, जहां मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया।
पदयात्रा के दौरान प्रदर्शनकारियों ने कहा कि विस्थापन के वर्षों बाद भी अनेक परिवार रोजगार, आवास, स्वास्थ्य और अन्य बुनियादी सुविधाओं से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। उनका कहना था कि पुनर्वास केवल भूमि या आवास उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रभावित परिवारों को सम्मानजनक जीवन, स्थायी रोजगार और बेहतर भविष्य के अवसर भी मिलना चाहिए।
ज्ञापन में सरकार से मांग की गई कि पुनर्वास नीति के अनुरूप प्रत्येक विस्थापित परिवार के शिक्षित युवक-युवती को सरकारी नौकरी उपलब्ध कराई जाए, ताकि विस्थापन से प्रभावित परिवार आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सकें। इसके अलावा पुनर्वास कॉलोनियों में रहने वाले परिवारों को आवासीय पट्टों का पूर्ण मालिकाना हक प्रदान करने की मांग भी प्रमुखता से उठाई गई।

रोजगार के मुद्दे पर प्रदर्शनकारियों ने कहा कि हरसूद क्षेत्र में बड़े उद्योग-धंधों की कमी के कारण स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में उन्हें अन्य शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है। ज्ञापन में मांग की गई कि हरसूद और आसपास के क्षेत्र में औद्योगिक इकाइयों की स्थापना कर स्थानीय स्तर पर रोजगार के पर्याप्त अवसर सृजित किए जाएं, जिससे युवाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिल सके और क्षेत्र का आर्थिक विकास भी हो।
स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी लोगों ने चिंता व्यक्त की। ज्ञापन में सिविल अस्पताल हरसूद में विशेषज्ञ डॉक्टरों और आवश्यक चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने की मांग की गई। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि डॉक्टरों की कमी के कारण मरीजों को उपचार के लिए खंडवा या अन्य शहरों का रुख करना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों की अतिरिक्त परेशानी उठानी पड़ती है।
आयोजक जय कनारे (ऑल अबाउट हरसूद) ने कहा कि हरसूद के विस्थापित परिवार और युवा लंबे समय से अपने अधिकारों और मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह पदयात्रा किसी विरोध का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात शासन तक पहुंचाने का प्रयास है। उन्होंने उम्मीद जताई कि मुख्यमंत्री और राज्य सरकार विस्थापित परिवारों की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय करेगी।
पदयात्रा में सामाजिक कार्यकर्ता अनिल हीरे, नरेन्द्र नागरे, केवल पटेल, मनोज बाबा, गणेश सावनेर, गणेश गायकवाड, राहुल सकवाल, प्रमोद चौरे, करण लोवंशी, सावन चाकरदे, पवन सावनेर, राजेश यादव, योगेश हिरे, महेंद्र बढ़ाई और रामचंद्र कासडे सहित अनेक लोग शामिल हुए। वहीं खालवा, निशानियां, नंदगांव, छिपीपुरा, सोनपुरा और भवरली सहित आसपास के गांवों से आए नागरिकों ने भी पदयात्रा में भाग लेकर अपना समर्थन जताया।
इस पदयात्रा ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि हरसूद के विस्थापित परिवार केवल पुनर्वास नहीं, बल्कि रोजगार, स्वास्थ्य, आवासीय अधिकार और सम्मानजनक जीवन की अपेक्षा रखते हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन-प्रशासन इन मांगों पर कितना गंभीरता से विचार करता है और विस्थापितों की वर्षों पुरानी समस्याओं के समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।

