खंडवा- जिले में खरीफ फसलों की बेहतर निगरानी और किसानों को संभावित नुकसान से बचाने के उद्देश्य से कृषि विभाग की डायग्नोस्टिक टीम लगातार खेतों का निरीक्षण कर रही है। इसी क्रम में विकासखंड खालवा के विभिन्न गांवों में मक्का एवं सोयाबीन फसलों का व्यापक निरीक्षण किया गया। निरीक्षण के दौरान मक्का फसल में फॉल आर्मीवर्म, हेलिकोवर्पा आर्मीजेरा तथा सेमीलूपर जैसे हानिकारक कीटों का प्रकोप पाया गया, जबकि सोयाबीन फसल में भी पत्ती खाने वाली इल्लियों और रस चूसने वाले कीटों की सक्रियता के संकेत मिले हैं।
कृषि विभाग की इस विशेष टीम में अनुविभागीय कृषि अधिकारी श्रीमती अमृता मोरे, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी श्री गोरेलाल वास्कले तथा कृषि वैज्ञानिक एवं कीट विशेषज्ञ श्री पी.डी. सिंह शामिल रहे। टीम ने खेतों में पहुंचकर फसलों की स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन किया और किसानों को कीटों की पहचान, उनके प्रभाव तथा वैज्ञानिक नियंत्रण उपायों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
मक्का फसल के लिए फॉल आर्मीवर्म बना बड़ी चुनौती
विशेषज्ञों ने बताया कि फॉल आर्मीवर्म वर्तमान समय में मक्का फसल का सबसे खतरनाक कीट माना जाता है। यह कीट पौधों की पत्तियों को तेजी से नुकसान पहुंचाता है और समय पर नियंत्रण नहीं होने पर उत्पादन में भारी गिरावट ला सकता है। निरीक्षण के दौरान कई खेतों में इसके लक्षण पाए गए, जिसके बाद किसानों को सतर्क रहने की सलाह दी गई।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को बताया कि फसल में कीट प्रकोप दिखाई देने पर अनुशंसित कीटनाशकों का निर्धारित मात्रा में उपयोग किया जाए। नियंत्रण के लिए HaNPV 250 LE प्रति हेक्टेयर, क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल 18.5 एससी, लैम्ब्डा सायहेलोथ्रिन 5 प्रतिशत ईसी तथा इमामेक्टिन बेंजोएट 5 एसजी के उपयोग की सलाह दी गई है। साथ ही किसानों को दवा छिड़काव के दौरान सुरक्षा मानकों का पालन करने के निर्देश भी दिए गए।
सोयाबीन में इल्लियों और रस चूसने वाले कीटों का खतरा
डायग्नोस्टिक टीम ने सोयाबीन फसल का निरीक्षण करते हुए पाया कि कई क्षेत्रों में पत्ती खाने वाली इल्लियों जैसे सेमीलूपर, तंबाकू इल्ली और चने की इल्ली के साथ-साथ सफेद मक्खी, जसीड, तना मक्खी एवं चक्र भृंग जैसे कीटों के प्रकोप की संभावना बनी हुई है। विशेषज्ञों ने बताया कि ये कीट पौधों की वृद्धि को प्रभावित कर उत्पादन क्षमता को कम कर सकते हैं।
किसानों को इन कीटों के संयुक्त नियंत्रण के लिए पूर्व मिश्रित कीटनाशकों के उपयोग की सलाह दी गई। इनमें थायोमेथोक्सम एवं लैम्ब्डा सायहेलोथ्रिन आधारित मिश्रण, बीटासायफ्लुथ्रिन एवं इमिडाक्लोप्रिड आधारित दवाएं तथा क्लोरएन्ट्रानिलिप्रोल एवं लैम्ब्डा सायहेलोथ्रिन युक्त कीटनाशक शामिल हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि निर्धारित मात्रा में छिड़काव करने से कीट नियंत्रण अधिक प्रभावी होता है।
नियमित निगरानी ही बचाव का सबसे प्रभावी उपाय
कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि वे अपने खेतों का नियमित निरीक्षण करें और पौधों की पत्तियों, तनों तथा नई बढ़वार पर विशेष ध्यान दें। यदि कहीं भी कीटों की उपस्थिति या नुकसान के लक्षण दिखाई दें तो तुरंत कृषि विभाग के मैदानी अमले अथवा कृषि वैज्ञानिकों से संपर्क करें।
विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश किसान तब कार्रवाई करते हैं जब कीटों का प्रकोप गंभीर हो जाता है, जबकि प्रारंभिक अवस्था में नियंत्रण करने पर फसल को बड़े नुकसान से बचाया जा सकता है। इसलिए निगरानी, समय पर पहचान और वैज्ञानिक प्रबंधन को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है।
वैज्ञानिक खेती से बढ़ेगी उत्पादकता
कृषि विभाग द्वारा किसानों को केवल कीट नियंत्रण ही नहीं, बल्कि समग्र फसल प्रबंधन के संबंध में भी मार्गदर्शन दिया जा रहा है। विभाग का उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक खेती की ओर प्रेरित करना है ताकि उत्पादन लागत कम हो और बेहतर उपज प्राप्त हो सके। विशेषज्ञों ने कहा कि बदलते मौसम और कीटों के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए आधुनिक कृषि तकनीकों को अपनाना समय की आवश्यकता बन गया है।
कृषि विभाग की डायग्नोस्टिक टीम द्वारा किया गया यह निरीक्षण किसानों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। समय रहते दी गई सलाह और तकनीकी मार्गदर्शन से मक्का एवं सोयाबीन फसलों को संभावित नुकसान से बचाने में मदद मिलेगी तथा किसानों की आय और उत्पादन दोनों में सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा।
